बी. जी. हार्मीन की ओर से
दि बांमे क्रौनिकल,
(सम्पादकीय विभाग)
1 जुलाई, 1917
प्रिय जवाहरलाल,
आपके 29 तारीख के पत्र के लिए धन्यवाद | गांधीजी यहाँ से कुछ गलत-सा ही खयाल लेकर गए
हैं | हम अपनी विरोध-सभा अगले शनिवार को कर रहे हैं | वह न की जाय, ऐसा तो हमने
कभी इरादा ही नहीं किया; परंतु गांधीजी का सुझाव यह था कि सभा की तारीख ऐसी हो कि
उसके तुरंत बाद निष्क्रिय प्रतिरोध किया जा सके | हमने-यानी, इस बातचीत के समय जो
लोग हाजिर थे, उनमें से बहुतो ने-यह मंजूर कर लिया | लेकिन गांधीजी ने हमसे कहा कि
हमारे कुछ करने से पहले वह मालवीयजी से मिल लें, और तबतक हम रुके रहें | फिर
उन्होंने इलहाबाद से तार दिया कि मालवीयजी अभी शिमला से लौटे नहीं हैं | इसलिए हम
अपनी योजना के अनुसार काम करने लगे | परंतु मैं निष्क्रिय प्रतिरोध तो पूरे दिल से
चाहता हूं | यह जरूरी है कि कुछ व्यावहारिक कदम उठाया जाय | हम निष्क्रिय प्रतिरोध
का एक घोषणा-पत्र हाश्ताक्षर के लिए लोगो के पास भेज रहे हैं, इसपर सबसे पहले
दस्तखत मैंने ही किये हैं | हां, आप तो जानते हैं कि बुजुर्ग कांग्रेसियों के साथ
हमारी कुछ मुश्किलें भी हैं, परंतु हमने उन्हें काफी झकझोर दिया है और हम उन्हें
खीचकर इतना आगे ले आये हैं कि जिसकी हमने कभी उम्मीद भी नहीं की थी |
मद्रास की यात्रा बड़ी कामयाब रही |
जैसाकि आप जानते हैं, हमने कुछ ही दिन से ‘न्यू इंडिया’ फिर से चालू कर दिया |
वह एक बहुत बड़ी जीत और दुश्मनों को करारी चोट थी | श्रीमती बेसेंट ने तो उसको फिर
से जारी कर सकने की आशा ही छोड़ दी थी | मद्रास की सभा भी काफी अच्छी रही |
जे. डी. आर. के बारे में, मुझे खेद के साथ
कहना पड़ रहा है कि यहाँ के मित्र अथवा उनमे से अधिकांश आपके द्वारा उठाये गए कदम
के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि स्वयं मैं तो अब भी समझता हूं कि वह अच्छा और सही,
दोनो था | जिन्ना, जिन्हें शुरू-शुरू में रंगरूटों की भर्ती के आंदोलन का समर्थन
करने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया जा सका था, अब विरोध के रूप में इस बात पर अड़ गये हैं कि उसे
छोड़ा न जाय, और मैं अकेला-सा पड़ गया दिखाई देता हूं |
आज सुना है कि मालवीयजी ने जिन्ना को तार
द्वारा सुझाया है कि आगामी 8 तारीख को आल इंडिया कांग्रेस कमेटी और मुस्लिम लीग
कौंसिल की एक संयुक्त कांफ्रेंस कर ली जाय | मैं समझता हूं कि अगर इन
पुराने-पुराने नेताओं में कुछ जोश फूका जा सके तो यह एक अच्छी बात होगी | अगर ऐसा
हो जाए तो मैं आशा करता हूं कि इलहाबाद में आप सब आयेंगे | मैं मालवीयजी से मिलने
और उनसे दिल खोलकर बात करने में इतना उत्सुक था कि अगर वह यहां न आ रहे होते तो
इसी काम के लिए मैं खुद इलहाबाद आता | जहां तक श्री सुरेन्द्रनाथ का संबंध है, अगर
वह मेरे हाथ पड़ जाय तो मुझे विश्वास है कि मैं उन्हें संभाल सकता हूं | ग्यारह साल
पहले जिस दिन मैं इस देश में आया, उसी दिन से मैं उन्हें जानता हूं और यह भी जानता
हूँ कि किस तरह उन्हें संभाला जा सकता है | लेकिन आजकल वह बुरे असर में है |
अगर कुछ प्रभाव डालना है तो
दो बातें जरूरी हैं -
1 कौंसिल के सदस्यों के इस्तीफे (इस विचार के लिए भगवान इलहाबाद को सलामत रखे
|)
2 यदि सरकार अपनी नीति नहीं बदलती है और एक निश्चित तारीख के पहले नजरबंदों को
नहीं छोड़ देती है तो निष्क्रिय प्रतिरोध शुरू कर दिया जाय |
जहां तक बम्बई का संबंध है, इन दोनों
कामों के लिए मुझसे जो बन पड़ेगा, मैं करूंगा | लेकिन एक अखिल भारतीय कांफ्रेस का
करना जरूरी है |
‘क्रौनिकल’ आपके पते पर जारी करने
के लिए मैंने दफ्तर में कह दिया है | मैं तो समझ रहा था कि मैं पहले ही कभी का ऐसा
कर चूका हूं |
सबके लिए आदर-सहित,
सप्रेम आपका,
बी. जी. हार्नीमन
[श्री हार्नीमन ‘बांबे
क्रौनिकल’ के लोकप्रिय और प्रभावशाली संपादक थे | पहले महायुद्ध के आख़िरी सालो
में और उसके बाद भी भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भाग अदा
किया था |
जे. डी. आर. एक प्रकार के सुरक्षित
सैनिक संगठन का सूचक है जो उस समय शिक्षित भारतीय नवयुवको को प्रशिक्षण देने के
लिए कायम किया गया था | हममें से कइयों ने इसमें शामिल होने का निश्चय किया और
अपने आवेदन-पत्र भेज दिए | यह प्रथम महायुद्ध के समय की बात है | इसके कुछ समय बात
श्रीमती एनी बेसेंट को नजरबंद किया गया | इससे हमको बड़ा आघात पहुंचा
और विरोधस्वरूप हमने अपने आवेदन-पत्र वापस ले लिए | ]
