म.ल.ओक्स के नाम
[6 से 14 तक के पत्र
मेरे निर्वासन के बारे में एक आज्ञा से सम्बन्ध रखते हैं, जो
मुझपर मसूरी से तामिल की गई थी | मुझे मिलने वाली इस तरह की पहली
आज्ञा थी | ]
सेवाय होटल, मसूरी
14 मई 1920
प्रिय श्री ओक्स,
आज सुबह जो आपसे बातचीत हुई उसपर, और सरकार ने मुझसे जो ‘निश्चित वचन’ चाहा है कि मसूरी–स्थित अफगान प्रतिनिधियो से न मिलूं और न उनसे
कोई पत्र व्यव्हार करूं, इस वावत भी गौर में विचार किया है | मुझे अफ़सोस
है कि इस बारे में मैं अपना ख्याल नहीं बदल सकता |
जैसा कि आप जानते हैं, मैं मसूरी
अपनी माता, पत्नी और बहनों के साथ सिर्फ इसलिए आया हूं कि मेरी पत्नी की तंदुरुस्ती
ठीक नहीं है | मेरा इरादा था कि जब तक मेरे पिताजी को यहाँ आने
की फुरसत नहीं मिलती , तब तक यहाँ ठहरता | अफगान प्रतिनिधियों से मुझे कुछ सरोकार नहीं है और यह संयोग है कि हम दोनों
एक ही होटल में ठहरे हैं | सच तो यह है कि उनकी मौजूदगी ने मेरे लिए कुछ असुविधा पैदा
की है, क्योंकि मैं उन कमरों को लेना चाहता था, जहां वे ठहरे हुए थे | इस प्रतिनिधि–मंडल में मेरी दिलचस्पी जरुर है, जैसा कि हर समझदार आदमी
को होनी चाहिए, लेकिन उनसे खासतौर से मिलने की कोशिश करने का
न कोई मेरा इरादा रहा
है और न है | हम लोग यहाँ पिछले सत्रह दिनों से रह रहे हैं और
इस बिच मैंने प्रतिनिधि-मंडल के एक आदमी को दूर से भी नहीं देखा है |आप इस बात को खुद जानते हैं, जैसा कि आपने आज सवेरे मुझे
बताया था | लेकिन हलाकि अफगानियो से मिलने का और उनसे पत्र-व्यव्हार करने का मेरा कोई भी ख्याल नहीं है, फिर भी
सरकार के इशारे से अपने को किसी तरह बांधने का विचार मुझे सख्त नापसंद है, भले ही ऐसा करना मेरे लिए असुविधाजनक क्यों न साबित हो | यह दरअसल अंत कारण की बात है | मुझे भरोसा है कि आप मेरी
हालत को समझेंगे | इसलिए यह कहते हुए मुझे दुःख है कि मै आपकी
इस मेहेरबानी–भरी सलाह को मानने से लचर हूं और सरकार को कोई वचन
नहीं दे सकता |
अगर सरकार मुझपर कोई आज्ञा लागु
करने का फैसला करती है तो इस समय तो इस समय तो मैं उसे मानने के लिए तैयार हूं | मेरे लिए
यह बड़ी असुविधा की बात होगी कि मैं अपने घरवालो को यहां अकेला छोड़कर यकायक नीचे चला
जाऊ | मेरी स्त्री की सेहत ऐसी है कि बड़ी सावधानी से देख-रेख की जरुरत है और मेरी माँ तो एकदम अपाहिज है और दोनों को बिना देख-रेख के छोड़ना
बहुत ही कठिन है | मेरे अचानक यहाँ से चले जाने से मेरे पिताजी
की और मेरी योजनाएं बिल्कुल उलट–पुलट हो जाएगी और इससे हमें बड़ी
हैरानी और फ़िक्र होगी, लेकिन सरकार के बढे मामलों में आदमी
की निजी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जा सकता, ऐसा मेरा खयाल है |
श्री एम एल ओक्स,
पुलिस सुप्रेतेंदेंत
हेर्मीतेज लाज, मसूरी |
भवदीय,
जवाहरलाल नेहरु
