#3 पत्र मोतीलाल नेहरू की ओर से

मोतीलाल नेहरू की ओर से

[मेरे पिताजी ने पंजाब के मार्शल-लॉ से पैदा हुए नतीजो में गहरी और निजी दिलचस्पी ली | उन्हीं के कहने से मार्शल-लॉ के फैसले के खिलाफ इंग्लिस्तान की प्रिवी कौंसिल में कुछ अपीलें दायर हुई | इनमें से एक अपील, जिसने उस समय बहुत ध्यान आकर्षित किया, अमृतसर के बग्गा और रतनचंद की थी | यह पत्र और इसके बाद के कई पत्र मेरे पिताजी ने आरा (बिहार) से लिखे थे, जहाँ वह उस समय जमींदारी के एक बड़े मुकदमे की पैरवी कर रहे थे | ]
आरा,
25 फरवरी, 1920
मेरे प्यारे जवाहर,
     तुम्हे मेरे पिछले ख़त से मालूम हुआ होगा, मैं बग्गा की अपील पर प्रिवी कौंसिल के फैसले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था, ऐसी बात नहीं है | लेकिन उसके खारिज होने की खबर से मुझे धक्का लगा | अपील करनेवाले दूसरे लोगो ने दंगों में जो भी हिस्सा लिया हो, इसके शक की जरा भी गुंजाइश नहीं कि बग्गा और रतनचंद उतने ही बेक़सूर है, जितनी कि इंदू | पंजाब का हर आदमीसरकारी या गैर-सरकारीयह बात जानता है, फिर भी उन्हें फांसी लगेगी | हमारे देश में नित्य होनेवाले अन्यायों में से यह तो लाखों में से एक मिसाल है | हम तो बस अपना फ़र्ज अदा कर सकते हैं और जो-जो उपाय हमारे लिए मुमकिन है, उन्हें कर सकते हैं | मैंने इस बारे में जो कुछ किया है, उसकी खबर मैं तुम्हें तार से दे चूका हूँ, लेकिन इतना ही काफी नहीं है | आगे जो कदम उठाने हैं, उनके बारे में मेरे सुझाव ये है :

       1 जगमोहन नाथ उनसब मुकदमो के, जिनमें अपीलें हुई हैं, अपील करनेवालों की एक पूरी फेहरिस्त तैयार करें | यह सूची टेकचंद के पास भेज दी जाय, ताकि वह पता लगाएं कि उनमे से कौन रिहा कर दिये गए हैं और कौन अभी जेल में है | टेकचंद नेवाइल के पास समुद्री तार से उनसब लोगों के नाम भेजे जो अब भी जेल में है और उनसे दरख्वास्त करे कि वह इनकी तरफ से रहम की अर्जी दे दे |

      2 हिन्दुस्तान भर में ख़ास-ख़ास जगहों पर, पंजाब के हर शहर में, और अमृतसर के हर मुहल्ले में आम सभाएं की जाय, इन मामलो में शाही ऐलान को लागू करने की मांग की जाय | इसके अलावा अमृतसर के जलसे यह भी तजवीज करे कि बग्गा और रतनचंद बेक़सूर है |
       यह कहना आसान है, पर करना मुश्किल है | लेकिन इसके लिए कोशिश होनी चाहिए | गांधीजी से सलाह-मशविरा करना चाहिए, लेकिन यह बहुत जल्दी होना चाहिए, क्योंकि वक़्त थोडा है | कानून के आख़िरी उपायों के हो चुकने पर फांसी फौरन दे दी जाती है, जैसा कि कटापुर की फासियों से साबित होता है |

       3 अगर 1 और 2 में नाकामयाबी हुई तब क्या करना होगा ? इस बाबत मेरे कुछ बहुत ही निश्चित विचार है, लेकिन जबतक 1 और 2 के नतीजों का पता लगे, मैं उन्हें बताना नहीं चाहता |
        मैं सोचता हूं कि तुम्हारी जिला कांफ्रेंस में मुझे मौजूद रहना चाहिए, चाहे हरिजी के बुलावे को छोड़ना ही क्यों पड़े | असल में उन्हें मेरी जरूरत नहीं, और मुझे भी असल में उनका पैसा नहीं चाहिए इस तरह बात बहुतकुछ साफ है | मेरे पास सोचने और फैसला करने के लिए दो दिन का वक़्त हित |
तुम्हारा स्नेही,

पिता

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