#4 पत्र : मोतीलाल नेहरू की ओर से

मोतीलाल नेहरू की ओर से
[आरा से 27 फरवरी 1920 को मेरे नाम भेजे गये पिताजी के पत्र से]
                                     
    जहाँ तक गांधीजी के राजनैतिक विचारो के प्रतिपादन करने की बात है, मैं उनके प्रति आदर रखते हुए भी उन विचारो को महज इसलिए मानने को तैयार नहीं हूँ कि वे उनके विचार हैं | मैं दास को पहले ही सचेत कर चूका हूँ कि हमे जोरदार खीचतान के लिए तैयार रहना चाहिए | गांधीजी शास्त्री से बातें करने दिल्ली जा रहे हैं | उनका मालवीय से लगातार ताल्लुक और उनसे आम रजामंदी हमारे दल के लिए अच्छी निशानी नहीं है और न खुद गांधीजी के ही लिए वह बहुत शुभ बात है | अपनी लोकप्रियता पर हद से ज्यादा भरोसा करना ठीक नहीं | श्रीमती बेसेंट इसकी कीमत चुका रही हैं और दूसरो के साथ भी ऐसा ही हुआ है | मुझे बहुत दुःख होगा, अगर यही बात गांधीजी के साथ हुई | अपनी मौजूदा हालत में मुझे किसी के भी राजनैतिक विचारों से झगड़ा करने का अधिकार नहीं, फिर गांधीजी और मालवीयजी जैसे प्रतिष्ठित लोगों से तो झगड़ा करने की बात और भी कम है, लेकिन जिस ढंग से देश शवल अख्तियार कर रहा है, उसकी तरफ से मैं आखें नहीं मूंद सकता | अधिकारियों या नरम दलवालो से समझौता करने की कोशिश का नतीजा बर्बादी होगा, भले ही वह किसी के जरिये हो | जो हालत है उसके बारे में मेरी अपनी राय तो यह है |

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